Washington/New Delhi: रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका और भारत के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोलने वाले एक अहम बिल को मंजूरी दे दी है। भारत और चीन इस कानून के दायरे में आने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं।
हालांकि, फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है। सीनेट से पारित होने के बाद बिल को आगे की विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा। कानून बनने की स्थिति में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाने का अधिकार मिल सकता है।
क्या है इस बिल में?
सीनेट से पारित प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों से आने वाले सामानों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति देता है।
इसका सीधा निशाना उन देशों पर है जो रूस के साथ ऊर्जा कारोबार जारी रखे हुए हैं। अमेरिका का तर्क है कि रूस से होने वाली ऊर्जा खरीद से मॉस्को को राजस्व मिलता है, जिसका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध के दौरान किया जा सकता है।
प्रस्ताव में रूस से जुड़े अधिकारियों, कारोबारी समूहों और वित्तीय संस्थानों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने के प्रावधान भी शामिल हैं।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है मुश्किल?
भारत रूस से कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों की ओर से रूसी तेल पर प्रतिबंधों के बीच भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया था।
इससे भारतीय रिफाइनरियों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर कच्चा तेल उपलब्ध कराने में मदद मिली। भारत लगातार यह कहता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला देश की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर किया जाता है।
अमेरिका इससे पहले भी रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगा चुका है। अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से होने वाले आयात पर रूसी तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। इससे कई भारतीय उत्पादों पर कुल अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
भारत ने क्यों नहीं रोकी रूसी तेल की खरीद?
भारत का तर्क है कि ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। रूस से मिलने वाला कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है।
नई दिल्ली यह भी कहती रही है कि वैश्विक बाजार में उपलब्ध विकल्पों, कीमतों और देश की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखकर ही तेल खरीद के फैसले लिए जाते हैं।
यही वजह है कि अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूसी तेल के साथ अपना कारोबार पूरी तरह बंद नहीं किया है।
अब आगे क्या होगा?
सीनेट से बिल पारित होने के बाद अगली नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और उसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी पर होगी। अगर यह कानून बनता है और इसका इस्तेमाल भारत जैसे देशों के खिलाफ किया जाता है, तो भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि, 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। फिलहाल यह एक संभावित अमेरिकी कार्रवाई है, जिसने भारत के लिए व्यापार और ऊर्जा नीति दोनों मोर्चों पर नई चुनौती खड़ी कर दी है।
भारत के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह अपनी सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखते हुए अमेरिका के बढ़ते व्यापारिक दबाव से किस तरह निपटता है।
