क्या वाकई अब दीपावली दीपावली रह गई है?

यह ऋतू सर्वोत्तम ऋतुओं में से एक मानी जाती है. बरसात बीत जाती है, आकाश निर्मल और शीतल हो जाता है. नदियों में साफ़ पानी बहने लगता है

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दीपावली प्रकाश का पर्व. दीपावली उन्नति और प्रगति का पर्व. इस पर्व पर घरों में सफाई की जाती है. बेकार चीज़ें, कूड़ा-करकट बाहर फेंक दिया जाता है. घरों सफेदी करा दी जाती है. स्वच्छता और प्रकाश के मिलन से अनुपम छटा उभर कर आती है. हर तरफ खुशहाली का माहौल होता है. यह ऋतू सर्वोत्तम ऋतुओं में से एक मानी जाती है. बरसात बीत जाती है, आकाश निर्मल और शीतल हो जाता है. नदियों में साफ़ पानी बहने लगता है. किसान के घर में उसकी मेहनत से उगाई गई फसल राखी होती है. सौ बात की एक बात की जाए तो यह पर्व सभी के लिए खुशीदायक और हर्ष का त्यौहार होता है.

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पुराने समय में मिटटी के दीये जलाए जाते थे. जिनमें सरसों का तेल डाला जाता था. सभी घर दीपक के प्रकाश के उजाले से चमक उठते थे. चूड़ा, लावा, भुना हुआ धन और मिठाइयों से हमारी जेबें भरी रहती थीं. जिन बच्चों के पास किसी कारण से नहीं होते थे उन्हें भी मिल जाया करते थे. हम सब मिल बांटकर तमाम पकवानों और मिठाइयों को खाया करते थे. घर के बगल में ही एक मुस्लिम परिवार रहता था. घर में लक्ष्मी पूजन के के बाद मम्मी और पापा घर में बने पकवान और मिठाइयां उनके घर लेकर जाया करते थे. ऐसा कभी नहीं लगा कि वो किसी और धर्म को मानने वाले लोग हों. वो हमारे त्यौहार में शामिल हुआ करते थे और वो हमारे त्योहारों में शामिल हुआ करते थे.

प्रतीककात्मक तस्वीर

लेकिन क्या अब सही मायने में इस शांति, एकता और प्यार के प्रतीक के त्योहार को उसके वास्तविक अर्थ के साथ मनाया जा रहा है? इतिहास में उल्लेख मिलता है कि इस दिन भगवान राम अपने चौदह साल के वनवास के बाद आयोध्या वापस लौटे थे. जिसकी ख़ुशी में उनके भाई भरत ने पूरी नगरी को दीयों से सजवा दिया था. पुरे आयोध्या में ख़ुशी का माहौल था. हर तरफ उल्लास ही उल्लास था. लेकिन आज क्या ऐसा संभव है. आज एक भाई दूसरे भाई को फूटी आंख नहीं सुहाता है. वो उसकी उन्नति देख नहीं सकता है. वो उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है. क्या केवल पटाखे फोड़ना, अच्छे पकवान खाना ही दीवाली मनाना है? क्या केवल घरों को साफकर उसकी सजावट करना ही दीवाली मनाना होता है?

प्रतीककात्मक तस्वीर

आज शहरों को देखा जाए तो सब प्रदूषण का चैंबर बने हुए हैं और इसका सबसे बड़ा कारण बताया जाता है कि दीवाली पर फोड़े जाने वाले पटाके. और वास्तविकता भी यही है. दीवाली के अगले दिन प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ जाता है कि कई दिन सांस लेना भी दूभर हो जाता है. तो क्यों ना इस दीवाली को प्रदूषण रहित मनाएं. इस दीवाली कुछ ऐसा क्यों ना करें जिससे इस पर्यावरण को हम प्रदुषण से बचा सकें. कुछ ऐसा करे जिससे आने वाले समय में प्रदूषण रूपी इस राक्षस को ख़त्म कर सकें.

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